यह चौपाई श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड अध्याय से है।

कैलाश पर्वत पर माला जपते हुए ध्यानमग्न भगवान शिव, तथा दूर श्रीराम के दिव्य स्वरूप की ओर जाती हुई सतीजी

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥

यह चौपाई बालकाण्डान्तर्गत शिव और पार्वती के संवाद में है।
भावार्थ : जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिव भगवान हरि का नाम जपने लगे और सती वहाँ गईं जहाँ सुख के धाम प्रभु राम थे।

प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?

बालकाण्ड में शिव-पार्वती संवाद के अंतर्गत सती-प्रसंग की यह चौपाई है। श्रीराम के ईश्वरत्व पर संदेह होने से सतीजी उनकी परीक्षा लेने चलीं। शिवजी ने समझाया, पर जब सतीजी नहीं मानीं तो उन्होंने विचार किया कि होगा वही जो श्रीराम ने रच रखा है, तर्क करके शाखा (विस्तार) कौन बढ़ाए। ऐसा कहकर वे हरिनाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गईं जहाँ सुख के धाम प्रभु श्रीराम थे।

शब्दार्थ

  • होइहि = होगा
  • रचि राखा = रच रखा है, निश्चित कर रखा है
  • को करि तर्क = कौन तर्क करके
  • साखा = शाखा, विस्तार
  • अस कहि = ऐसा कहकर
  • जपन हरिनामा = हरिनाम का जप
  • सुखधामा = सुख के धाम (प्रभु श्रीराम)

शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव

यह उत्तर धैर्य और समर्पण का है। कार्य के होने में संदेह है, और हठ या कुतर्क से बात बनेगी नहीं। श्रेयस्कर यही है कि परिणाम भगवान् पर छोड़ दें और अपना कर्तव्य करते हुए उनका स्मरण करें।

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