यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड में आती है।

संध्या के युद्धभूमि में गिरे हुए रावण के पास शोकाकुल बैठी मंदोदरी, उनके निकट पड़ा हुआ टूटा मुकुट और धनुष

बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥

यह चौपाई लंकाकाण्ड में रावन की मृत्यु के पश्चात् मन्दोदरी के विलाप के प्रसंग में है।
भावार्थ : वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो।

प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?

लंकाकाण्ड में रावण की मृत्यु के पश्चात् मन्दोदरी विलाप करते हुए कहती है: जिस रावण के सामने युद्ध में वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु जैसे देवता भी धैर्य नहीं धर पाते थे, जिसने अपने भुजबल से काल और यमराज तक को जीत लिया था, हे स्वामी! वही आज अनाथ की भाँति पड़ा है।

श्रीरामचरितमानस (जिसे तुलसी रामायण भी कहा जाता है) में इस चौपाई का पूरा प्रसंग पढ़ें।

श्रीरामचरितमानस में पूरा प्रसंग पढ़ें

रोमन लिप्यंतरण

Barun Kuber Sures Samira. Ran Sanmukh Dhari Kahun Na Dhira.. Bhujbal Jitehu Kal Jam Sain. Aaju Parehu Anath Ki Nain..

रोमन लिपि में यह चौपाई ‘Barun Kuber Sures Samira’ या ‘Varun Kuber Suresh Sameera’ के रूप में भी लिखी जाती है। वर्तनी भिन्न हो सकती है, चौपाई वही है।

शब्दार्थ

  • बरुन = वरुण (जल के देवता)
  • कुबेर = धन के देवता
  • सुरेस = इंद्र
  • समीरा = वायु
  • रन सन्मुख = युद्ध में सामने
  • धीरा = धैर्य
  • भुजबल = भुजाओं के बल से
  • काल जम = काल और यमराज
  • साईं = स्वामी
  • अनाथ की नाईं = अनाथ के समान

शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव

यह प्रतिकूल उत्तर है। बड़ी से बड़ी शक्ति और साधन भी अहंकार तथा अधर्म के मार्ग पर स्थायी नहीं रहते, यही इस प्रसंग की चेतावनी है। कार्य की पूर्णता में संदेह है; दिशा और साधन दोनों पर पुनर्विचार करें।

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