
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव
यह उत्तर संगति की ओर संकेत करता है। जिस कार्य के विषय में पूछा है, उसमें आस-पास की संगति अनुकूल नहीं है; खोटे लोगों का साथ छोड़ने पर ही मार्ग स्पष्ट होगा। वर्तमान स्थिति में कार्य की पूर्णता संदिग्ध है।
प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?
यह चौपाई भी बालकाण्ड के सत्संग-वर्णन की है। तुलसीदासजी कहते हैं कि सत्संगति पाकर दुष्ट भी सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना सोना बन जाता है। किंतु भाग्यवश यदि सज्जन कुसंगति में पड़ जाएँ, तो भी वे सर्प की मणि के समान अपने ही गुणों का अनुसरण करते हैं; संगति का दोष उन पर स्थायी नहीं होता।
श्रीरामचरितमानस में पूरा प्रसंग पढ़ेंश्रीरामचरितमानस (जिसे तुलसी रामायण भी कहा जाता है) में इस चौपाई का पूरा प्रसंग पढ़ें।शब्दार्थ
- सठ
- दुष्ट
- सतसंगति
- संतों की संगति
- पारस परस
- पारसमणि के स्पर्श से
- कुधात
- लोहे जैसी निम्न धातु
- सुहाई
- सुहावनी (सोना) हो जाती है
- बिधि बस
- भाग्यवश
- सुजन
- सज्जन
- कुसंगत
- बुरी संगति
- फनि मनि
- सर्प के फन की मणि
- निज गुन अनुसरहीं
- अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं
रोमन लिप्यंतरण
Sath Sudharahin Satsangati Pai। Paras Paras Kudhat Suhai॥ Bidhi Bas Sujan Kusangat Parahin। Fani Mani Sam Nij Gun Anusarahin॥
रोमन लिपि में यह चौपाई ‘Bidhi Bas Sujan Kusangat Parahin’ या ‘Vidhi Bas Sujan Kusangat Parhi’ के रूप में भी लिखी जाती है। वर्तनी भिन्न हो सकती है, चौपाई वही है।