यह चौपाई श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड अध्याय से है।

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
यह चौपाई भी बालकाण्ड के आरम्भ में ही सत्संग-वर्णन के प्रसंग की है।
भावार्थ : दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुंदर सोना बन जाता है), किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)
प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?
यह चौपाई भी बालकाण्ड के सत्संग-वर्णन की है। तुलसीदासजी कहते हैं कि सत्संगति पाकर दुष्ट भी सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना सोना बन जाता है। किंतु भाग्यवश यदि सज्जन कुसंगति में पड़ जाएँ, तो भी वे सर्प की मणि के समान अपने ही गुणों का अनुसरण करते हैं; संगति का दोष उन पर स्थायी नहीं होता।
शब्दार्थ
- सठ = दुष्ट
- सतसंगति = संतों की संगति
- पारस परस = पारसमणि के स्पर्श से
- कुधात = लोहे जैसी निम्न धातु
- सुहाई = सुहावनी (सोना) हो जाती है
- बिधि बस = भाग्यवश
- सुजन = सज्जन
- कुसंगत = बुरी संगति
- फनि मनि = सर्प के फन की मणि
- निज गुन अनुसरहीं = अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं
शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव
यह उत्तर संगति की ओर संकेत करता है। जिस कार्य के विषय में पूछा है, उसमें आस-पास की संगति अनुकूल नहीं है; खोटे लोगों का साथ छोड़ने पर ही मार्ग स्पष्ट होगा। वर्तमान स्थिति में कार्य की पूर्णता संदिग्ध है।