यह चौपाई श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड अध्याय से है।

भक्तों से भेंट स्वीकार करते हुए एक भड़कीले वस्त्रधारी पाखंडी साधु, जिसकी दीपक की रोशनी में पड़ती परछाईं एक छिपे हुए राक्षसी रूप को उजागर करती है

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥

यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है।
भावार्थ : जो (वेषधारी) ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का सा) वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ।

प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?

बालकाण्ड के आरम्भ में गोस्वामी तुलसीदासजी संतों की महिमा और असंतों की प्रकृति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जगत में जो ठग सुंदर (साधु का) वेष धारण कर लेते हैं, वेष के प्रताप से उनकी भी पूजा हो जाती है। परन्तु अन्त में उनका कपट उघड़ ही जाता है, निर्वाह नहीं होता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हुआ।

शब्दार्थ

  • लखि = देखकर
  • सुबेष = सुंदर (साधु) वेष
  • बंचक = ठग, कपटी
  • बेष प्रताप = वेष के प्रभाव से
  • पूजिअहिं = पूजे जाते हैं
  • उघरहिं = उघड़ जाते हैं, उजागर हो जाते हैं
  • निबाहू = अंत तक निर्वाह
  • जिमि = जैसे

शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव

यह सावधान करने वाला उत्तर है। जो कार्य या व्यक्ति ऊपर से जैसा दिखता है, भीतर से वैसा नहीं है; दिखावे पर भरोसा न करें। कार्य की सफलता में संदेह है, इसलिए भलीभाँति जाँच-परख कर ही आगे बढ़ें।

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