प्रातःकाल एक बरगद वृक्ष के नीचे भजन-कीर्तन और शास्त्र-पाठ करते संत, तथा पीछे दो नदियों के दिव्य संगम का दृश्य
यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आती है।

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥

यह चौपाई बालकाण्ड में संत-समाजरुपी तीर्थ के वर्णन में है।
भावार्थ : संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत् में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं।

शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव

यह शुभ उत्तर है। प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा, विशेषतः यदि संतजनों और सज्जनों का संग तथा परामर्श साथ रहे, क्योंकि इस चौपाई का हृदय ही सत्संग की महिमा है।

प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?

बालकाण्ड में तुलसीदासजी संत-समाज की तुलना तीर्थराज प्रयाग से करते हैं। संतों का समाज आनंद और कल्याण से भरा हुआ चलता-फिरता तीर्थराज है, जहाँ राम-भक्ति गंगाजी की धारा के समान बहती है और ब्रह्म-विचार की चर्चा सरस्वती के समान प्रवाहित होती है।

श्रीरामचरितमानस में पूरा प्रसंग पढ़ेंश्रीरामचरितमानस (जिसे तुलसी रामायण भी कहा जाता है) में इस चौपाई का पूरा प्रसंग पढ़ें।

शब्दार्थ

मुद
आनंद
मंगलमय
कल्याण से पूर्ण
जंगम
चलता-फिरता
तीरथराजू
तीर्थों का राजा (प्रयाग)
सुरसरि
गंगा
सरसइ
प्रवाहित होती है
ब्रह्म बिचार प्रचारा
ब्रह्म-विचार की चर्चा

रोमन लिप्यंतरण

Mud Mangalmay Sant Samaju। Jo Jag Jangam Tirathraju॥ Ram Bhakti Jahan Sursari Dhara। Sarasai Brahma Bichar Prachara॥

रोमन लिपि में यह चौपाई ‘Mud Mangalmay Sant Samaju’ या ‘Mud Mangal Mai Sant Samaju’ के रूप में भी लिखी जाती है। वर्तनी भिन्न हो सकती है, चौपाई वही है।

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