यह चौपाई श्री रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड अध्याय से है।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
यह चौपाई श्रीहनुमान् जी के लंका प्रवेश करने के समय की है।
भावार्थ : अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
प्रसंग: यह चौपाई श्रीरामचरितमानस में कहाँ है?
यह उसी सुन्दरकाण्ड प्रसंग की अर्धाली है जब हनुमानजी लंका में प्रवेश करने को हैं और लंकिनी उन्हें आशीर्वाद देती है। भाव यह है कि जिसके हृदय में कोसलपुर के राजा श्रीराम बसते हैं, उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के समान छोटा हो जाता है और अग्नि शीतल हो जाती है।
शब्दार्थ
- गरल = विष
- सुधा = अमृत
- रिपु = शत्रु
- मिताई = मित्रता
- गोपद = गाय के खुर का चिह्न
- सिंधु = समुद्र
- अनल = अग्नि
- सितलाई = शीतलता
शलाका उत्तर के रूप में इसका भाव
यह बहुत श्रेष्ठ उत्तर है। श्रीराम के स्मरण से प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो जाती हैं; कार्य की सफलता में संदेह नहीं, बस प्रभु-स्मरण के साथ आगे बढ़ें।