शलाका से उत्तर मिल जाने के बाद असली काम आरम्भ होता है। सबसे पहले दिखाई देने वाली संक्षिप्त परिणाम-पंक्ति, जैसे "कार्य सिद्ध होगा" या "कार्य होने में सन्देह है", उत्तर का सार है, उत्तर नहीं। उसी पर रुक जाने से पाठ अधूरा रह जाता है।
यह पृष्ठ बताता है कि प्राप्त चौपाई को किस क्रम से पढ़ा जाए, अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार के उत्तरों को किस भाव से लिया जाए, और उत्तर को अपने निर्णय में किस सीमा तक स्थान दिया जाए।
उत्तर को तीन स्तरों पर पढ़ें
हर उत्तर के तीन स्तर होते हैं, और तीनों को क्रम से पढ़ने पर ही उसका पूरा भाव खुलता है। पहला स्तर दिशा देता है, दूसरा अर्थ, और तीसरा वह अनुप्रयोग जो केवल आप कर सकते हैं।
पहला स्तर: परिणाम-पंक्ति
यह उत्तर का सबसे संक्षिप्त रूप है और केवल प्रारंभिक संकेत देता है। इससे इतना समझें कि उत्तर का झुकाव किस ओर है: आश्वासन की ओर, प्रतीक्षा की ओर, या सावधानी की ओर। इसे अंतिम निष्कर्ष न मानें; यह पूरे उत्तर का शीर्षक भर है।
दूसरा स्तर: पूर्ण चौपाई, कांड और प्रसंग
यही सबसे महत्वपूर्ण चरण है और प्रायः यही छोड़ दिया जाता है। पूर्ण चौपाई पढ़ें, फिर देखें कि वह मानस के किस कांड से है और किस प्रसंग में कही गई है: वहाँ कौन बोल रहा है, किससे, और किस परिस्थिति में।
प्रसंग जानते ही उत्तर का स्वर प्रायः बदल जाता है। जो पंक्ति अकेले पढ़ने पर इनकार लगती थी, वह अपने प्रसंग में परामर्श निकलती है; और जो सहज आश्वासन लगती थी, वह किसी गुण या आचरण की शर्त के साथ आती है।
तीसरा स्तर: अपनी स्थिति में उतारना
अंत में उत्तर को अपने प्रश्न के सामने रखें। चौपाई किस गुण की ओर संकेत कर रही है: धैर्य, विवेक, संगति का चुनाव या समर्पण? उस गुण को अपनी वर्तमान परिस्थिति पर लागू करें। यह स्तर कोई ग्रंथ या ऐप आपके लिए पूरा नहीं कर सकता।
एक उदाहरण: "होइहि सोइ जो राम रचि राखा"
मान लीजिए आपको यह चौपाई मिली और परिणाम-पंक्ति कहती है कि कार्य होने में सन्देह है, अतः उसे भगवान् पर छोड़ देना श्रेयस्कर है। तीनों स्तरों पर इसे इस प्रकार पढ़ा जाएगा।
- 1परिणाम-पंक्ति दिशा बताती है: कार्य अनिश्चित है। इसे नोट करें, पर यहीं न रुकें; "सन्देह" का अर्थ सीधा "नहीं" नहीं होता।
- 2पूर्ण चौपाई बालकाण्ड के सती-प्रसंग की है। सतीजी को श्रीराम के ईश्वरत्व पर सन्देह हुआ। शिवजी ने उन्हें बार-बार समझाया, पर जब उनका सन्देह दूर नहीं हुआ तो उन्होंने सतीजी को स्वयं परीक्षा लेने की अनुमति दी। उनके जाने के बाद शिवजी ने विचार किया कि होगा वही जो श्रीराम ने रच रखा है, पूछा कि तर्क करके बात को कौन बढ़ाए, और वे हरिनाम जपने लगे।
- 3प्रसंग के साथ पढ़ने पर यह उत्तर इनकार नहीं, हठ के विरुद्ध परामर्श है: अपना कर्तव्य करें, पर परिणाम को बलपूर्वक मोड़ने का प्रयास न करें। यहाँ शिवजी हार नहीं मान रहे; वे व्यर्थ के आग्रह को छोड़ रहे हैं।
- 4अपनी स्थिति में इसे ऐसे उतारें: थोड़ा रुकें, समझदार जनों का परामर्श लें, अनावश्यक तर्क-वितर्क छोड़ें, और परिणाम की चिंता किए बिना अपना कार्य करते रहें।
ध्यान दीजिए कि केवल परिणाम-पंक्ति पढ़ने पर यह उत्तर निराशाजनक लगता था। प्रसंग के साथ पढ़ने पर वह निराशा नहीं, एक स्पष्ट और शांत परामर्श निकला। लगभग हर चौपाई के साथ ऐसा ही होता है।
यदि उत्तर प्रतिकूल लगे तो
नौ उत्तरों में से कुछ सावधानी या प्रतीक्षा की ओर संकेत करते हैं। ऐसा उत्तर मिलने पर भय या निराशा स्वाभाविक है, पर परंपरा में इन्हें दंड की तरह कभी नहीं देखा गया।
ऐसे उत्तर को आत्मपरीक्षण के निमंत्रण की तरह लें। चौपाई प्रायः किसी विशेष बात की ओर संकेत करती है: कहीं संगति की, कहीं हठ की, कहीं समय के अपरिपक्व होने की। पूछिए कि आपकी परिस्थिति में वह संकेत किस पर लागू होता है। यही उस उत्तर का उपयोग है।
और यह भी स्मरण रखें कि उत्तर आपकी परिस्थिति पर अंतिम निर्णय नहीं है। वह इस समय की एक दृष्टि है। परिस्थितियाँ बदलती हैं, और आपका प्रयास तथा आचरण उन्हें बदलने में सम्मिलित रहते हैं।
एक ही प्रश्न बार-बार पूछने के विषय में
जब उत्तर मन के अनुकूल न हो तो उसे फिर से पूछने की इच्छा होती है। परंपरा में इसे उचित नहीं माना गया, और इसका कारण व्यावहारिक है।
बार-बार पूछने से आप उत्तर नहीं खोज रहे होते; आप अपनी पहले से बनी हुई इच्छा की पुष्टि खोज रहे होते हैं। इस प्रक्रिया में मन शांत नहीं होता, बल्कि और अधिक अस्थिर हो जाता है, और अंततः किसी भी उत्तर पर विश्वास नहीं रह जाता।
यदि उत्तर स्पष्ट न लगे तो नया उत्तर खोजने के बजाय उसी चौपाई के प्रसंग और भावार्थ को धीरे-धीरे पढ़ें। प्रायः अस्पष्टता उत्तर में नहीं, उसे पढ़ने की जल्दबाजी में होती है।
उत्तर और व्यावहारिक निर्णय
शलाका का उत्तर आध्यात्मिक मार्गदर्शन है। वह आपके विवेक का स्थान लेने के लिए नहीं है, उसके साथ चलने के लिए है।
जहाँ निर्णय गंभीर हो, जैसे स्वास्थ्य, धन, संबंध, या किसी और के जीवन को प्रभावित करने वाला विषय, वहाँ योग्य और विश्वसनीय जनों का परामर्श उतना ही आवश्यक है। परंपरा इन दोनों को विरोधी नहीं मानती। श्रद्धा और विवेक साथ-साथ चलते हैं।
सबसे उपयोगी दृष्टि यही है: चौपाई से पूछिए कि इस समय आपसे कौन-सा भाव अपेक्षित है, और उस भाव के साथ अपना कर्तव्य कीजिए। परिणाम पर आग्रह छोड़ देना ही मानस का बार-बार दोहराया गया परामर्श है।
