श्री राम शलाका प्रश्नावली गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस से मार्गदर्शन पाने की एक पुरानी भक्तिपूर्ण परंपरा है। मन में एक प्रश्न रखकर, श्रीराम का स्मरण करते हुए, अक्षरों की एक सारणी में से कोई एक अक्षर चुना जाता है; उसी चयन से एक चौपाई-पंक्ति निकलती है, जो उस प्रश्न पर विचार करने की दिशा देती है।
बाहर से यह प्रक्रिया बहुत सरल दिखती है, और इसीलिए प्रायः इसे केवल शुभ-अशुभ बताने वाला साधन मान लिया जाता है। परंपरा में इसका आशय इससे कहीं गहरा रहा है। प्राप्त चौपाई अपने साथ एक पूरा प्रसंग लेकर आती है, और उस प्रसंग को पढ़े बिना उत्तर अधूरा रह जाता है। यह पृष्ठ इसी परंपरा का परिचय देता है: यह कहाँ से आई, इसकी गणना कैसे बनती है, और इसे किस भाव से ग्रहण करना चाहिए।
राम शलाका, रामायण प्रश्नावली, रामचरितमानस प्रश्नावली: एक ही परंपरा के नाम
इस परंपरा को अलग-अलग नामों से खोजा जाता है, और यही भ्रम का एक बड़ा कारण भी है। कोई इसे राम शलाका कहता है, कोई रामायण प्रश्नावली, तो कोई रामचरितमानस प्रश्नावली। ये तीनों अलग-अलग विधियाँ नहीं हैं; ये सभी एक ही परंपरा के नाम हैं।
"शलाका" का अर्थ है पतली सींक, तीली या संकेतक। परंपरा में भक्त इसी शलाका को छपी हुई सारणी पर रखकर अपना अक्षर चुनते थे, और इसी उपकरण के नाम पर पूरी विधि का नाम "राम शलाका" पड़ा। "प्रश्नावली" उस प्रश्नोत्तर परंपरा का नाम है जिसमें इस सारणी का उपयोग होता है। चूँकि हर उत्तर श्रीरामचरितमानस से आता है, इसे रामचरितमानस प्रश्नावली या संक्षेप में रामायण प्रश्नावली भी कहा जाता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्तर वाल्मीकि रामायण से नहीं, बल्कि गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस से आते हैं। "रामायण प्रश्नावली" नाम लोकप्रिय अवश्य है, पर मूल ग्रंथ मानस ही है।
यह परंपरा कहाँ से आई है?
राम शलाका की सारणी श्रीरामचरितमानस के लोकप्रिय संस्करणों के आरम्भ में बहुत समय से छपती आई है, जिनमें गीताप्रेस (गोरखपुर) के प्रचलित संस्करण भी शामिल हैं। इन व्यापक रूप से पढ़ी जाने वाली प्रतियों के कारण यह पृष्ठ अनेक परिवारों के लिए जाना-पहचाना हुआ।
विधि सीधी थी। भक्त शांत मन से बैठते; प्रश्न मन में स्थिर करते; श्रीराम का स्मरण करते; और आँखें बंद करके शलाका को सारणी के किसी एक अक्षर पर रख देते। वह अक्षर ही उत्तर का आरम्भ-बिंदु बनता था।
इस विधि में जो बात सबसे महत्वपूर्ण मानी गई, वह चयन की यांत्रिकता नहीं, बल्कि उससे पहले का भाव था: प्रश्न की स्पष्टता, मन की स्थिरता और श्रद्धा। परंपरा में यह मान्यता रही है कि जिस भाव से प्रश्न पूछा जाता है, उत्तर उसी भाव से खुलता है।
सारणी और गणना: उत्तर बनता कैसे है?
सारणी में कुल 225 अक्षर होते हैं, जो पंद्रह पंक्तियों और पंद्रह स्तंभों में सजे रहते हैं। ऊपर से देखने पर ये अक्षर बिखरे हुए लगते हैं, पर उनमें एक निश्चित क्रम छिपा होता है।
आप जिस अक्षर को चुनते हैं, उसे पहला अक्षर मानकर आगे हर नौवाँ अक्षर क्रम से लिया जाता है। सारणी के अंत तक पहुँचने पर गणना आरम्भ से चलती रहती है। इस प्रकार जो अक्षर एकत्र होते हैं, वे मिलकर एक पूरी पंक्ति बनाते हैं। वह पंक्ति श्रीरामचरितमानस की किसी चौपाई की अर्धाली होती है।
इसी गणना के कारण सारणी से कुल नौ ही उत्तर-पंक्तियाँ निकल सकती हैं। आप 225 में से कोई भी अक्षर चुनें, आपकी पंक्ति इन्हीं नौ में से एक होगी। यह अनिश्चित या मनमाना चयन नहीं है; सारणी इसी तरह रची गई है।
उत्तर देने वाली नौ पंक्तियाँ और आठ चौपाइयाँ
नौ उत्तर-पंक्तियाँ आठ चौपाइयों से ली गई हैं। इनमें से एक चौपाई दो उत्तर-पंक्तियाँ देती है। ये चौपाइयाँ मानस के एक ही स्थान से नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग कांडों से चुनी गई हैं: बालकाण्ड, सुन्दरकाण्ड और लंकाकाण्ड।
यही विविधता उत्तरों को उनका स्वर देती है। किसी चौपाई में कार्य की सिद्धि का आश्वासन है, किसी में प्रतीक्षा और धैर्य का परामर्श, किसी में कुसंग से बचने की चेतावनी, और किसी में परिणाम को भगवान् पर छोड़ देने की सलाह। हर पंक्ति अपने मूल प्रसंग का भाव साथ लेकर आती है।
इसीलिए उत्तर को पढ़ते समय केवल उसकी संक्षिप्त व्याख्या पर रुक जाना पर्याप्त नहीं होता। जिस प्रसंग में वह चौपाई मानस में आई है, उसे जानने पर उत्तर का अर्थ प्रायः बदल जाता है: कठोर लगने वाला उत्तर परामर्श बन जाता है, और सरल लगने वाला उत्तर एक शर्त रख देता है।
प्रश्न पूछने की विधि
परंपरा में विधि से अधिक भाव पर बल दिया गया है, फिर भी क्रम इस प्रकार रहा है:
- 1शांत होकर बैठें और प्रभु श्रीराम का स्मरण करें। मन की चंचलता कम होने दें।
- 2अपना प्रश्न मन में स्पष्ट रूप से रखें। प्रश्न जितना अस्पष्ट होगा, उत्तर उतना ही अस्पष्ट लगेगा।
- 3श्रद्धा के साथ सारणी के किसी एक अक्षर को चुनें। चुनते समय सोच-विचार न करें।
- 4प्राप्त पंक्ति को पढ़ें, फिर उसकी पूर्ण चौपाई, उसका कांड, प्रसंग और भावार्थ भी पढ़ें।
- 5उत्तर को आत्ममंथन, प्रार्थना और व्यावहारिक विवेक के साथ अपनी स्थिति में रखें।
एक ही प्रश्न को बार-बार पूछना परंपरा में उचित नहीं माना गया है। बार-बार पूछने से मन स्थिर नहीं होता, बल्कि और अधिक अशांत होता है। एक उत्तर को शांतिपूर्वक समझना अधिक फलदायी माना गया है।
इसे भविष्यवाणी क्यों नहीं मानना चाहिए?
यह प्रश्न सबसे अधिक पूछा जाता है, और इसका उत्तर स्पष्ट है: राम शलाका भविष्य बताने का साधन नहीं है। परंपरा में इसे कभी ज्योतिष या भविष्यकथन की तरह नहीं देखा गया।
चौपाई जो देती है वह एक दृष्टि है: आपकी परिस्थिति को किस भाव से देखा जाए, किस गुण की इस समय आवश्यकता है, कहाँ धैर्य चाहिए और कहाँ सावधानी। "कार्य सिद्ध होगा" का अर्थ यह नहीं कि प्रयास छोड़ दिया जाए, और "सन्देह है" का अर्थ सीधा "नहीं" नहीं होता।
शलाका का उत्तर आपके विवेक, आपकी जिम्मेदारी और आपके परिश्रम का स्थान नहीं लेता। वह उनके साथ चलता है। जहाँ निर्णय गंभीर हो, वहाँ अनुभवी और विश्वसनीय जनों का परामर्श उतना ही आवश्यक है जितना यह मार्गदर्शन।
ऑनलाइन प्रश्नावली और छपी हुई सारणी में क्या अंतर है?
व्यवहार में अंतर केवल माध्यम का है। यह ऐप उसी 225 अक्षरों की सारणी और उसी नौवें-अक्षर की गणना का पालन करता है जो मानस के छपे संस्करणों में दी गई है। जो स्थान पहले छपे पृष्ठ और शलाका का था, अब वह आपकी उँगली और स्क्रीन ने ले लिया है।
एक अंतर अवश्य है, और वह सहायक है। छपी हुई सारणी उत्तर-पंक्ति तो देती थी, पर उसका प्रसंग और भावार्थ खोजने के लिए पूरा ग्रंथ पलटना पड़ता था। यहाँ हर चौपाई का पूर्ण पाठ, उसका कांड, प्रसंग, शब्दार्थ, भावार्थ और ऑडियो एक ही स्थान पर उपलब्ध है। इससे उत्तर को उसकी पूरी गहराई में पढ़ना सरल हो जाता है।
