रामायण प्रश्नावली चार्ट, सभी उत्तर और अर्थ
पारंपरिक 15×15 राम शलाका सारणी
यह केवल चार्ट का चित्र नहीं, बल्कि 225 अक्षरों वाली वास्तविक 15×15 सारणी है। यह पृष्ठ सारणी को देखने, प्रिंट करने और PDF में सहेजने के लिए है। ऑनलाइन उत्तर पाने के लिए शलाका ऐप की इंटरैक्टिव सारणी का उपयोग करें।
| सु | प्र | उ | बि | हो | मु | ग | ब | सु | नु | बि | घ | धि | इ | द |
| र | रु | फ | सि | सि | रहिं | बस | हि | मं | ल | न | ल | य | न | अं |
| सुज | सो | ग | सु | कु | म | स | ग | त | न | ई | ल | धा | बे | नो |
| त्य | र | न | कु | जो | म | रि | र | र | अ | की | हो | सं | रा | य |
| पु | सु | थ | सी | जे | इ | ग | म | सं | क | रे | हो | स | स | नि |
| त | र | त | र | स | हुँ | ह | ब | ब | प | चि | स | हिं | स | तु |
| म | का | ा | र | र | म | मि | मी | म्हा | ा | जा | हू | हीं | ा | ा |
| ता | रा | रे | री | हृ | का | फ | खा | जू | ई | र | रा | पू | द | ल |
| नि | को | जो | गो | न | मु | जि | यँ | ने | मनि | क | ज | प | स | ल |
| हि | रा | मि | स | रि | ग | द | न्मु | ख | म | खि | जि | म | त | जं |
| सिं | ख | नु | न | को | मि | निज | र्क | ग | धु | ध | सु | का | स | र |
| गु | ब | म | अ | रि | नि | म | ल | ा | न | ढ़ | ती | न | क | भ |
| ना | पु | व | अ | ा | र | ल | ा | ए | तु | र | न | नु | वै | थ |
| सि | हुँ | सु | म्ह | रा | र | स | स | र | त | न | ख | ा | ज | ा |
| र | ा | ा | ला | धी | ा | री | ा | हू | हीं | खा | जू | ई | रा | रे |
राम शलाका के 9 उत्तर और उनके भावार्थ
सारणी का प्रत्येक खाना अंततः श्रीरामचरितमानस की इन 9 उत्तर-पंक्तियों में से किसी एक तक पहुँचता है।
उत्तर 1
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥
प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न उत्तम है, कार्य सिद्ध होगा।
हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मनःकामना पूरी होगी। नारद का वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषों से रहित) और सत्य है। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 2
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
भगवान् का स्मरण करके कार्यारम्भ करो, सफलता मिलेगी।
अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 3
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
इस कार्य में भलाई नहीं है। कार्य की सफलता में सन्देह है।
जो (वेषधारी) ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का सा) वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 4
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
खोटे मनुष्यों का संग छोड़ दो। कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।
दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुंदर सोना बन जाता है), किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं। (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।)
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 5
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
कार्य होने में सन्देह है, अतः उसे भगवान् पर छोड़ देना श्रेयस्कर है।
जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। (मन में) ऐसा कहकर शिव भगवान हरि का नाम जपने लगे और सती वहाँ गईं जहाँ सुख के धाम प्रभु राम थे।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 6
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथ राजू॥
प्रश्न उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा।
संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत् में चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जहाँ (उस संत समाज रूपी प्रयागराज में) राम भक्ति रूपी गंगाजी की धारा है और ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 7
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
प्रश्न बहुत श्रेष्ठ है। कार्य सफल होगा।
अयोध्यापुरी के राजा श्री रघुनाथजी को हृदय में रखे हुए नगर में प्रवेश करके सब काम कीजिए। उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 8
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥
कार्य पूर्ण होने में सन्देह है।
वरुण, कुबेर, इंद्र और वायु, इनमें से किसी ने भी रण में तुम्हारे सामने धैर्य धारण नहीं किया। हे स्वामी! तुमने अपने भुजबल से काल और यमराज को भी जीत लिया था। वही तुम आज अनाथ की तरह पड़े हो।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ेंउत्तर 9
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे॥
प्रश्न बहुत उत्तम है। कार्य सिद्ध होगा
फूल पाकर मुनि ने पूजा की। फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर राम-लक्ष्मण सुखी हुए।
पूर्ण चौपाई, प्रसंग और मार्गदर्शन पढ़ें
8 पूर्ण मूल चौपाइयाँ
9 उत्तर-पंक्तियाँ 8 पूर्ण चौपाइयों से आती हैं, क्योंकि दो उत्तर-पंक्तियाँ एक ही मूल चौपाई का भाग हैं।
मूल चौपाई 1 · बालकाण्ड
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
यह चौपाई बालकाण्ड में श्रीसीताजी के गौरीपूजन के प्रसंग में है। गौरीजी ने श्रीसीताजी को आशीर्वाद दिया है।
मूल चौपाई 2 · सुन्दरकाण्ड
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
यह चौपाई सुन्दरकाण्ड में हनुमानजी के लंका में प्रवेश करने के समय की है।
मूल चौपाई 3 · बालकाण्ड
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
यह चौपाई बालकाण्ड के आरम्भ में सत्संग-वर्णन के प्रसंग में है।
मूल चौपाई 4 · बालकाण्ड
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
यह चौपाई भी बालकाण्ड के आरम्भ में ही सत्संग-वर्णन के प्रसंग की है।
मूल चौपाई 5 · बालकाण्ड
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
यह चौपाई बालकाण्डान्तर्गत शिव और पार्वती के संवाद में है।
मूल चौपाई 6 · बालकाण्ड
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥
यह चौपाई बालकाण्ड में संत-समाजरुपी तीर्थ के वर्णन में है।
मूल चौपाई 7 · लंकाकाण्ड
बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा॥ भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं॥
यह चौपाई लंकाकाण्ड में रावन की मृत्यु के पश्चात् मन्दोदरी के विलाप के प्रसंग में है।
मूल चौपाई 8 · बालकाण्ड
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही॥ सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भय सुखारे॥
यह चौपाई बालकाण्ड पुष्पवाटिका से पुष्प लाने पर विश्वामित्रजी का आशीर्वाद है।